HISTORY OF KANGRA IN HIMACHAL PRADESH

काँगड़ा का इतिहास

काँगड़ा हिमाचल प्रदेश का ऐतिहासिक नगर तथा जिला है; इसका अधिकतर भाग पहाड़ी है। इसके उत्तर और पूर्व में क्रमानुसार लघु हिमालय तथा बृहत्‌ हिमालय की हिमाच्छादित श्रेणियाँ स्थित हैं। पश्चिम में सिवालिक (शिवालिक) तथा दक्षिण में व्यास और सतलज के मध्य की पहाड़ियाँ हैं। बीच में काँगड़ा तथा कुल्लू की सुन्दर उपजाऊ घाटियाँ हैं। काँगड़ा चाय और चावल तथा कुल्लू फलों के लिए प्रसिद्ध है। व्यास (विपासा) नदी उत्तर-पूर्व में रोहतांग से निकलकर पश्चिम में मीर्थल नामक स्थान पर मैदानी भाग में उतरती है। काँगड़ा जिले में कड़ी सर्दी पड़ती है परंतु गर्मी में ऋतु सुहावनी रहती है, इस ऋतु में बहुत से लोग शैलावास के लिए यहाँ आते हैं; जगह-जगह देवस्थान हैं अत: काँगड़ा को देवभूमि के नाम से भी अभिहित किया गया है। हाल ही में लाहुल तथा स्पीत्ती प्रदेश का अलग सीमांत जिला बना दिया गया है और अब काँगड़ा का क्षेत्रफल 4,280 वर्ग मील रह गया है।

काँगड़ा नगर लगभग 2,350 फुट की ऊँचाई पर, पठानकोट से 52 मील पूर्व स्थित है। हिमकिरीट धौलाधार पर्वत तथा काँगड़ा की हरी-भरी घाटी का रमणीक दृश्य यहाँ दृष्टिगोचर होता है। यह नगर बाणगंगा तथा माँझी नदियों के बीच बसा हुआ है। दक्षिण में पुराना किला तथा उत्तर में बृजेश्वरी देवी के मंदिर का सुनहला कलश इस नगर के प्रधान चिह्न हैं। एक ओर पुराना काँकड़ा तथा दूसरी ओर भवन (नया काँगड़ा) की नयी बस्तियाँ हैं। काँगड़ा घाटी रेलवे तथा पठानकोट-कुल्लू और धर्मशाला-होशियारपुर सड़कों द्वारा यातायात की सुविधा प्राप्त है। काँगड़ा पहले ‘नगरकोट’ के नाम से प्रसिद्ध था और ऐसा कहा जाता है कि इसे राजा सुसर्माचंद ने महाभारत के युद्ध के बाद बसाया था। छठी शताब्दी में नगरकोट जालंधर अथवा त्रिगर्त राज्य की राजधानी था। राजा संसारचंद (18वीं शताब्दी के चतुर्थ भाग में) के राज्यकाल में यहाँ पर कलाकौशल का बोलबाला था। “काँगड़ा कलम” विश्वविख्यात है और चित्रशैली में अनुपम स्थान रखती है। काँगड़ा किले, मंदिर, बासमती चावल तथा कटी नाक की पुन: व्यवस्था और नेत्रचिकित्सा के लिए दूर-दूर तक विख्यात था। 1905 के भूकम्प में नगर बिल्कुल उजड़ गया था, तत्पश्चात्‌ नयी आबादी बसायी गयी। यहाँ पर देवीमंदिर के दर्शन के लिए हजारों यात्री प्रति वर्ष आते हैं तथा नवरात्र में बड़ी चहल-पहल रहती है।

प्राचीन काल में त्रिगर्त नाम से विख्यात काँगड़ा हिमाचल की सबसे खूबसूरत घाटियों में एक है। धौलाधर पर्वत श्रृंखला से आच्छादित यह घाटी इतिहास और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। एक जमाने में यह शहर चंद्र वंश की राजधानी थी। काँगड़ा का उल्लेख 3500 साल पहले वैदिक युग में मिलता है। पुराण, महाभारत तथा राजतरंगिणी में इस स्थान का जिक्र किया गया है।

काँगड़ा का मानचित्र 

जिले के प्रसिद्ध स्थल 
बृजेश्वरी देवी मंदिर

यह मंदिर इस क्षेत्र का सबसे लोकप्रिय मंदिर है। कहा जाता है पहले यह मंदिर बहुत समृद्ध था।, इस मंदिर को बहुत बार विदेशी लुटेरों द्वारा लूटा गया। महमूद गजनवी ने 1009 ई॰ में इस शहर को लूटा और मंदिर को नष्ट कर दिया था। यह मंदिर 1905 ई॰ में विनाशकारी भूकम्प से पूरी तरह नष्ट हो गया था। सन् 1920 में इसे दोबारा बनवाया गया। अजय बन्‍याल ने इसके लिए काफी अहम कार्य किया है जो कि आज भी किताबों में ढूंढने पर नहीं मिल पाता है अधिक जानकारी के लिए अखिल भारतीय पंडित कर्मचारी संगठन के राष्‍ट्रीय संगठन अध्‍यक्ष तारा चंद शर्मा से रिपन अस्पताल में सम्पर्क कर सकते हैं।


कांगड़ा किला

कांगड़ा किले का निर्माण कांगड़ा राज्य (कटोच वंश) के राजपूत परिवार ने करवाया था, जिन्होंने खुद को प्राचीन त्रिगत  साम्राज्य, जिसका उल्लेख महाभारत, पुराण में किया गया है के वंशज होने का प्रमाण दिया था। ये हिमाचल में मौजूद किलो में सबसे विशाल और भारत में पाये जाने किलो में सबसे पुराना किला है। सं 1615 में, मुग़ल सम्राट अकबर ने इस किले पर घेराबंदी की थी परन्तु वो इसमें असफल रहा। इसके पश्चात सं 1620 में, अकबर के पुत्र जहांगीर ने चंबा के राजा (जो इस क्षेत्र के सभी राजाओ में सबसे बड़े थे) को मजबूर करके इस किले पर कब्ज़ा कर लिया। मुग़ल सम्राट जहांगीर ने सूरज मल की सहायता से अपने सैनिकों को इस किले प्रवेश करवाया था।

 
कटोच के राजाओ ने मुग़ल शासन के कमजोर नियंत्रण और मुग़ल शक्ति की गिरावट के कारण लगातार मुग़ल नियंत्रित क्षेत्रों को लुटा। सं 1789 में राजा संसार चंद II ने अपने पूर्वाजो के प्राचीन किले को बचा लिया। महाराजा संसार चंद ने गोरखाओं के साथ कई युद्ध किये थे जिनमे एक ओर गोरखा और दूसरी ओर सिख राजा महाराजा रंजीत सिंह होते थे। संसार चंद इस किले का प्रयोग अपने पडोसी राज्य के राजाओ को कैद करने के लिए किया था जो उनके खिलाफ हुए षड्यंत्र का कारण बन गया। सिखों और कटोचो के बीच हुए एक युद्ध के दौरान, किले के द्वार को आपूर्ति के लिए खुल रखा गया था। सं 1806 में गोरखा सेना ने इस खुले द्वार से किले में प्रवेश कर लिया। ये सेना महाराजा संसार चंद और महाराजा रंजीत सिंह के बीच एक गठबंधन का कारण बनी। इसके बाद सं 1809 में गोरखा सेना पराजित हो गयी और अपनी रक्षा करने के लिए युद्ध से पीछे हट गयी और सतलुज नदी के पार चली गयी। इसके पश्चात सं 1828 तक ये किला कटोचो के अधीन ही रहा क्योकि संसार चंद की मृत्यु के पश्चात रंजीत सिंह ने इस किले पर कब्ज़ा कर लिया था। अंत में सं 1846 में सिखों के साथ हुए युद्ध में इस किले पर ब्रिटिशो ने अपना शासन जमा लिया। परन्तु 4 अप्रैल 1905 में आये एक भीषण भूकम्प आया जिसमे उन्होंने इस किले को छोड़ दिया।
 
किला देखे
पालमपुर चाय बागान

पालमपुर हिमाचल प्रदेश की काँगड़ा घाटी में एक प्राकृतिक रूप से समृद्ध हिल स्टेशन और नगरपालिका है, जो कि चाय बागानों और देवदार के जंगलों से घिरा है। पालमपुर उत्तर-पश्चिम भारत की चाय की राजधानी है, लेकिन चाय ही एक ऐसा पहलू नहीं है जो पालमपुर को एक विशेष रुचि स्थल बनाता है। पहाड़ों की निकटता और पानी की बहुतायत ने इसे हल्के जलवायु के साथ संपन्न किया है। शहर ने अपना नाम स्थानीय शब्द “पलुम” से प्राप्त किया है, जिसका अर्थ है बहुत पानी। पहाड़ी से पालमपुर के मैदानों तक बहने वाली कई नदियों हैं, हरियाली और पानी का संयोजन पालमपुर को एक विशिष्ट रूप देता है, पालमपुर मैदानों और पहाड़ियों के संगम पर है और इसलिए बहुत सुन्दर दिखता है| एक तरफ मैदानी और दूसरी तरफ धौलाधार की हसीन पहाड़ियां हैं, जो वर्ष केअधिकांश समय के लिए बर्फ से ढके हुए रहती है|

 
पोंग डैम

हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के शिवालिक पहाड़ियों के आर्द्र भूमि पर ब्यास नदी पर बाँध बनाकर एक जलाशय का निर्माण किया गया है जिसे महाराणा प्रताप सागर नाम दिया गया है। इसे पौंग जलाशय या पौंग बांध के नाम से भी जाना जाता है। यह बाँध 1975 में बनाया गया था। महाराणा प्रताप के सम्मान में नामित यह जलाशय या झील एक प्रसिद्ध वन्यजीव अभयारण्य है और रामसर सम्मेलन द्वारा भारत में घोषित 25 अंतरराष्ट्रीय आर्द्रभूमि साइटों में से एक है।जलाशय 24,529 हेक्टेयर (60,610 एकड़) के एक क्षेत्र तक फैला हुआ है, और झीलों का भाग 15,662 हेक्टेयर (38,700 एकड़) है।

पौंग जलाशय हिमाचल प्रदेश में हिमालय की तलहटी में सबसे महत्वपूर्ण मछली वाला जलाशय है। इस जलाशय में महासीर मछली अत्याधिकता मे पाई जाती है 

 

 

मक्लोडगंज

मक्लोडगंज धर्मशाला के निकट एक हिल स्टेशन है, जो ट्रेकर्स के बीच लोकप्रिय है। इसकी संस्कृति तिब्बती का एक बहुत अच्छा मिश्रण है जिसमें कुछ ब्रिटिश प्रभावों के साथ मक्लोडगंज की वर्तनी भी है| मक्लोडगंज कांगड़ा जिले के धर्मशाला का एक उपनगर है।
तिब्बतियों की बड़ी आबादी के कारण इसे “लिटिल ल्हासा” या “ढसा” (मुख्य रूप से तिब्बतियों द्वारा धर्मशास्त्र का एक छोटा रूप) के रूप में जाना जाता है। तिब्बती सरकार में निर्वासन का मुख्यालय मक्लोडगंज में है। इसकी औसत ऊंचाई 2,082 मीटर (6,831 फीट) है| यह धौलाधार रेंज पर स्थित है, जिसका उच्चतम शिखर, “हनुमान का टीब्बा”, लगभग 5,639 मीटर (18,500 फीट) पर स्थित है|

ज्वालामुखी मंदिर

ज्वालामुखी मंदिरतीर्थ यात्रा का यह लोकप्रिय स्थान कांगड़ा से बहुत दूर नहीं है । पवित्रता में खोखले चट्टान से निकलने वाली एक सदाबहार लौ, देवी की अभिव्यक्ति माना जाता है हर साल मार्च-अप्रैल और सितंबर-अक्टूबर के दौरान नवरात्रि उत्सव के दौरान यहाँ मेले आयोजित होते हैं। कांगड़ा में सबसे प्रसिद्ध ज्वाला जी मंदिर हिमाचल प्रदेश राज्य के कांगड़ा जिले के ज्वालामुखी शहर में निचले हिमालय में स्थित है, जो धर्मशाला से लगभग 55 किलोमीटर दूर है। ज्वालाजी एक हिंदू देवी है। ज्वालाजी ज्वाला देवी और ज्वालामुखी के नाम से भी जानी जाती है। ऐतिहासिक रूप से, ज्वाला जी को समर्पित मंदिर में माँ सती की जीभ गिरी थी | इस मंदिर में माता के दर्शन ज्योति रूप में होते है। ज्वालामुखी मंदिर के समीप में ही बाबा गोरा नाथ का मंदिर है। जिसे गोरख डिब्बी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निमार्ण राजा भूमि चंद ने करवाया था। बाद में महाराजा रणजीत सिंह और राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निमार्ण कराया। मंदिर के अंदर माता की नौ ज्योतियां है जिन्हें, महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यावासनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अम्बिका के नाम से जाना।

चामुंडा देवी मंदिर

चामुंडा देवी मंदिरचमुंडा देवी मंदिर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में है। यह पालमपुर से लगभग 10 किमी पश्चिम में बनेर नदी पर है। करीब 400 साल पहले राजा और एक ब्राह्मण पुजारी ने मंदिर को आसानी से सुलभ स्थान पर ले जाने के लिए अनुमति के लिए देवी से प्रार्थना की। देवी ने एक सहमति में पुजारी को अपनी सहमति दे दी और पुजारी को एक निश्चित स्थान में खोदने के लिए निर्देश दिया और कहा एक प्राचीन मूर्ति मिल जाएगी जिसे मंदिर में स्थापित कर देना। राजा ने मूर्ति को लाने के लिए पुरुषों को भेजा, हालांकि वे इसे ढूंढने में तो सक्षम थे लेकिन इसे उठा नहीं सके। एक बार फिर देवी सपने में पुजारी को दिखाई दी और उसने समझाया कि पुरुष पवित्र अवशेष को नहीं उठा सकते क्योंकि वे इसे एक साधारण पत्थर मानते हैं। देवी ने उसे सुबह सुबह उठने, स्नान करने, साफ़ कपड़े पहने और सम्मानजनक तरीके से जगह पर जाने के निर्देश दिए। पुजारी ने वैसा ही किया और वह उस मूर्ति को उठा कर स्थापित किया। यह देख कर सब हैरान थे तब उसने बताया कि यह देवी की ही शक्ति है जो वह मूर्ति स्थापित कर सका।

 

 

मसरूर मंदिर

मसरूर मंदिर भारत के हिमाचल प्रदेश राज्य में ब्यास नदी की काँगड़ा घाटी में पत्थर काट कर बनाए गए हिन्दू मंदिरों का एक समूह है। यह 8वीं शताब्दी के आरम्भ में बनाए गए थे और धौलाधार पर्वतों की ओर मुख रख के खड़े हैं। यह उत्तर भारतीय नगर वास्तुशैली में बने हैं। यहाँ के कई मंदिर अतीत में आए भूकम्पों से हानिग्रस्त हुए थे, लेकिन अभी भी कई खड़ें हैं। इन मंदिरों को एक ही महान शिला से काटकर शिखरों के साथ तराशा गया था।

डल झील

डल झील एक छोटी सी मध्यम ऊंचाई वाली झील (समुद्र तल से 1,775 मीटर ऊपर) है, जो कि कांगड़ा हिमाचल प्रदेश में मैकलोडगंज नड्डी रोड पर तोता रानी के गांव के पास धर्मशाला से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। डल झील मक्लोटगंज से पश्चिम की ओर 2 किमी है। झील देवदार के हरे-भरे वनों के बीच का घिरी हुई है , डल झील अपनी सुंदरता और तीर्थयात्रा केंद्र के लिए प्रसिद्ध है। दाल झील के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक स्वर्ग है। झील का क्षेत्र एक हेक्टेयर (यानी 10,000 वर्ग मीटर) के आसपास है। दाल झील के किनारे पर एक प्रसिद्ध भगवान शिव मंदिर स्थित है, जिसे बहुत पवित्र माना जाता है और 200 वर्ष पुराना है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, दुर्वास नामक ऋषि ने यहां भगवान शिव की उपासना की थी।डल झील एक छोटी सी मध्यम ऊंचाई वाली झील (समुद्र तल से 1,775 मीटर ऊपर) है, जो कि कांगड़ा हिमाचल प्रदेश में मैकलोडगंज नड्डी रोड पर तोता रानी के गांव के पास धर्मशाला से 11 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। डल झील मक्लोटगंज से पश्चिम की ओर 2 किमी है। झील देवदार के हरे-भरे वनों के बीच का घिरी हुई है , डल झील अपनी सुंदरता और तीर्थयात्रा केंद्र के लिए प्रसिद्ध है। दाल झील के आसपास का क्षेत्र प्राकृतिक स्वर्ग है। झील का क्षेत्र एक हेक्टेयर (यानी 10,000 वर्ग मीटर) के आसपास है। दाल झील के किनारे पर एक प्रसिद्ध भगवान शिव मंदिर स्थित है, जिसे बहुत पवित्र माना जाता है और 200 वर्ष पुराना है। एक पौराणिक कथा के अनुसार, दुर्वास नामक ऋषि ने यहां भगवान शिव की उपासना की थी।

 

धर्मशाला स्टेडियम

धर्मशाला दुनिया का 114वां और भारत का 27वां स्टेडियम है
धौलाधर पहाड़ियों की गोद में बसा और समुद्र तल से 1317 मीटर की उंचाई पर स्थित हिमाचल प्रदेश क्रिकेट संघ (एचपीसीए) स्टेडियम धर्मशाला दुनिया का 114वां और भारत का 27वां टेस्ट स्थल बनने के लिए तैयार है।

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